Sunday, July 12, 2015

सपनों का हमसफर



















रोज रोज पता नहीं क्यूँ
वो मेरे सपनों में आता है,
बातचीत नहीं होती लेकिन
फिर भी एक पहचान सी हो गयी है,
जैसे उस वॉचमैन से हो गयी है
जो मिलता है हर रोज दफ्तर जाते वक़्त,
सपनों के सफ़र की शुरुआत अकेले ही होती है अक्सर
लेकिन किसी न किसी मोड़ से वो साथ लग लेता है,
बिना कुछ कहे बिना कुछ सुने.
जब सुबह को किसी आहट से नींद टूट जाती है
तो सपनों का सफ़र बीच में ही अधूरा रह जाता है
और ये सपनों का साथी भी कहीं बीच में ही खो जाता है,
बातचीत नहीं होती लेकिन
फिर भी एक पहचान सी हो गयी है
इस अनबोले हमसफ़र से. 

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